Sat. Mar 7th, 2026

स्तन कैंसर के इलाज के दुष्प्रभाव नए प्रोग्नोस्टिक टेस्ट से कम करें, लेकिन शीघ्र डायग्नोज होना महत्वपूर्ण

जीवन शैली  में बदलाव जैसे कि मोटापा या वजन बढ़ना, अस्वास्थ्यकर खाने की आदत, कोई शारीरिक गतिविधि न करना, धूम्रपान करना, ज्यादा उम्र में बच्चे पैदा करना, बच्चों को कम स्तनपान कराना जैसे कई कारक हैं जो महिलाओ में स्तन कैंसर को पैदा करने के लिए जिम्मेदार होते हैं। पारंपरिक रूप से स्तन कैंसर इलाज मास्टेक्टॉमी (ब्रेस्ट रिमूवल), कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी से होता था।

ब्रेस्ट कैंसर इलाज में ट्यूमर को निकालने के लिए सर्जरी करनी पड़ती है। पिछले एक दशक में स्तन  कैंसर के इलाज में प्रगति हुई है। अब स्तन  को समान आकार में संरक्षित किया जा सकता है और एस्थेटिक्स को ऑनकोप्लास्टी से लगाया जा सकता है। सेंटिनल लिम्फ नोड बॉयोप्सी से कई मरीजों में एक्सिलरी नोड डिसेक्शन (विच्छेदन) से जुड़ी रोगों की संख्या से बचा जा सकता है।

हालांकि सर्जरी से कैंसर का दिखाई देने वाला हिस्सा निकाल लिया जाता है लेकिन माइक्रोस्कोपिक कैंसर सेल्स (कोशिकाएं) फिर भी अंदर रह सकती हैं। इन बचे हुए कैंसर सेल्स को शरीर के अन्य भागों में न होने या कैंसर मेटास्टेसाइजिंग के खतरे को ख़त्म करने के लिए दवाओं वाली कई थेरेपी के माध्यम से इसे ठीक किया जाता है। दवाओं वाली इन थेरेपी में रेडिएशन थेरेपी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी या हार्मोनल थेरेपी कैंसर के प्रकार और मरीज की हालत के आधार पर होती है।

पारम्परिक रूप से सर्जरी के बाद ज्यादातर मरीजों में कीमोथेरेपी इलाज का हिस्सा होता है।  स्टेज 1 और स्टेज 2 में कीमोथेरेपी केवल 8 से 10% मरीजों को फायदा पहुंचाती है। इस हिसाब से 90% मरीज आवश्यक रूप से कीमोथेरेपी कराते हैं। अब ऐसे टेस्ट मौजूद हैं कि जिसको करने से ऑन्कोलॉजिस्ट को अंदाजा हो जाता है  कि किस मरीज में कीमोथेरेपी फायदेमंद होगी और किस मरीज में नहीं। कोई दवा-आधारित थेरेपी इस बात पर निर्भर करती है कि क्या मरीज के शरीर में कोई कैंसर की कोशिका बची रह गयी है और क्या ये कोशिकाएं इस बीमारी से छुटकारा पाने में घातक है या नहीं। कैनअसिस्ट ब्रेस्ट जैसे प्रोग्नोस्टिक टेस्ट से शुरूआती चरण के ब्रेस्ट कैंसर मरीज में बीमारी के खतरे का आकलन कर सकते हैं जिससे कि डॉक्टर मरीज को बता सकते हैं कि उनको कीमोथेरेपी कराने की जरुरत है या नहीं।

बंसल हॉस्पिटल के ऑन्कोलॉजी सर्विस के हेड डॉ अतुल समैया ने कहा, “हाल के वर्षों में स्तन कैंसर के इलाज के तौर-तरीके बहुत एडवांस हुए है और हम हर मरीज में इलाज को अनुकूलित करने में सफल हुए है। पहले हर तरह के मरीजों को एक ही तरह के इलाज को कराना पड़ता था और इस तरह के इलाज में कठिन कीमोथेरेपी परहेज शामिल होता था, यह बहुत कमजोर कर देने वाली प्रक्रिया होती है। हालांकि आज के समय में  कैनअसिस्ट ब्रेस्ट जैसे प्रोग्नोस्टिक टेस्ट के साथ-साथ हार्मोन रिसेप्टर टेस्ट्स कराने से डॉक्टर सफलतापूर्वक यह पता लगा लेते हैं कि किन मरीजों का इलाज बिना कीमोथेरेपी से बेहतर हो सकता है। इससे कई मरीजों में ओवर-इलाज को न कराने में मदद मिलती है, इससे बेहतर परिणाम मिलता है और मरीज के जीवन की गुणवत्ता भी सुधरती है।”

महत्वपूर्ण बात यह है कि  ईएसएमओ, एनसीसीएन और एएससीओ  जैसी टॉप की अंतरराष्ट्रीय ऑन्कोलॉजी संस्था  आज के समय में कीमोथेरेपी के इस्तेमाल के लिए पहले प्रोग्नोस्टिक टेस्ट जैसे कि आंकोटाइप Dx, मैंमप्रिंट, प्रोसिग्ना और कैनअसिस्ट करने की सलाह देते हैं। दुनिया भर के ऑन्कोलॉजिस्ट का कहना है कि प्रोग्नोस्टिक टेस्ट की पहुँच ज्यादा से ज्यादा मरीजों तक होने से वे बीमारी के परिणाम में सुधार कर सकते हैं और मरीज की जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार कर सकते हैं।  हालांकि ये टेस्ट इलाज की तुलना में महंगे होते हैं और भारत में इसकी उपलब्धता बहुत बड़ी समस्या है। पश्चिमी प्रोग्नोस्टिक टेस्ट की अन्य लिमिटेशन यह है कि उनमे भारतीय मरीजों की जानकारी नहीं रहती है। इसलिए भारत में मरीजों को प्रोग्नोस्टिक टेस्ट द्वारा क्लासीफाइड कम खतरा होने के बावजूद उन्हें अभी भी कीमोथेरेपी कराना पड़ता है।

कीमोथेरेपी ड्रग्स शरीर में बढ़ती हुई कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को ख़त्म करने में मददगार होती है,  लेकिन ये ड्रग्स स्वस्थ बॉडी सेल्स पर भी बुरा असर डालती है। इसलिए कीमोथेरेपी से कई दुष्प्रभाव होते हैं जिसमे बालों का झड़ना, चक्कर आना, डायरिया, भूख की कमी और अन्य पेट संबंधी समस्याओं के साथ-साथ गंभीर मांसपेशी, हार्ट तथा हेमोटोलोजिकल समस्याएं भी होती है। कम खतरे वाले मरीजों के पास यह मौका होता है कि वे कीमोथेरेपी से बच सकते हैं, यह उनमे दुबारा कैंसर होने के बहुत कम अवसर पर निर्भर होता है। भारत में विकसित कैनअसिस्ट ब्रेस्ट एक ऐसा सस्ता प्रोग्नोस्टिक टेस्ट है जो ज्यादा और कम खतरे का संकेत बेहतर सटीकता के साथ देता है।

डॉ समैया ने आगे कहा, “कीमोथेरेपी और आक्रामक इलाज को न कराने से न केवल मरीज की जिंदगी सुधरती है बल्कि इलाज में होने वाले खर्च में बचत होती है। सबसे जरूरी चीज यह है कि इस बीमारी का शुरूआती चरण में पता चल जाए। अंतिम चरण (लास्ट स्टेज) में डायग्नोज होने से मरीज इस तकनीक से फायदा नहीं उठा सकता है। दुर्भाग्यवश रूप से वर्तमान में भारत में 60% से ज्यादा ब्रेस्ट कैंसर के मरीज  लास्ट स्टेज में डायग्नोज किये जाते हैं।”

मध्य प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में ब्रेस्ट कैंसर के केसेस बढ़े हैं। स्क्रीनिंग प्रोग्राम की कमी, जागरूकता की कमी, अंतिम स्टेज में इस कैंसर से डायग्नोज होना अभी भी महत्वपूर्ण चिंता बनी हुई है।

प्रोग्नोस्टिक टेस्ट से लाभ लेने के अलावा स्टेज 1 या 2 में डायग्नोज किए गए मरीज ब्रेस्ट-कंजर्विंग सर्जरी (स्तन-संरक्षण सर्जरी) (BCS) करा सकते हैं और मास्टेक्टॉमी के मनोवैज्ञानिक तनाव से बच सकते हैं। ब्रेस्ट कैंसर के शुरूआती चरण में सेंटिनल लिम्फ नोड बायोप्सी से 75% से ज्यादा मरीजों में एक्सिलरी नोड  डिसेक्शन (विच्छेदन) से भी बचा जा सकता है और महत्वपूर्ण रूप से एक्सिलरी नोड डिसेक्शन जैसे कि लिम्फोएडेमा, शोल्डर सिंड्रोम, अपर लिंब के उपयोग में लिमिटेशन को रोका जा सकता है।

इस बीमारी के सम्बन्ध में फैली अफवाहों को ख़त्म करने, महिलाओं को इस रोग को शुरुआती स्टेज में पता लगाने हेतु शिक्षित करने और वार्षिक स्क्रीनिंग प्रैक्टिस को स्थापित करना समय की मांग है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed