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प्रथम पुण्यतिथि सच्चे श्रम साधक थे, स्व. प्रभात झा

स्व. प्रभात झा मूलतः बिहार के थे लेकिन उनकी कर्म भूमि मध्यप्रदेश ही रही । वे बहुत कम उम्र जिए, लेकिन जितना भी जिये उतने समय में लोगों के दिलों में अपना एक अमिट स्थान बनाकर गये। स्व. प्रभात झा परिश्रमी व्यक्ति थे, वे श्रम साधक थे, श्रम ही उनकी साधना थी और इसी श्रम की वजह से उन्होंने स्वास्थ्य की परवाह नहीं की। बचपन में श्रम किया, युवावस्था में श्रम किया और पत्रकार बने, पत्रकारिता में भी उन्होने अपना झंडा ऊँचा बनाये रखा। ग्वालियर में एक समय ऐसा था कि अख़बार की पहचान ही प्रभात जी से होने लगी। तभी से वे भारतीय जनता पार्टी से भी जुड़ गये और पत्रकारिता व पार्टी का काम पूरे समर्पण भाव, सत्यनिष्ठा, लगन व ईमानदारी से किया। चूंकि पार्टी सत्ता में नहीं थी इसलिए कार्यकर्ता काम कराने प्रभात जी के पास ही पहुंच जाते और वे बिना संकोच के कार्यकर्ता का काम करते। मैंने देखा है कि प्रभात जी को प्रेस से घर तक छोड़ने के लिये ऑटो, रिक्शा वाले पैसे तक नहीं लेते थे। ग्वालियर जैसे महानगर में ज्यादा तर घरों में उनका सीधा आना-जाना था।
 
उस समय इतने संसाधन नहीं होते थे लेकिन सीमित संसाधनों में भी वे गजब का काम करते थे। लोग अख़बार में प्रभात जी की खबर ही नहीं देखते थे बल्कि अख़बार भी प्रभात जी की खबर पढ़ने के लिये लेते थे। अयोध्या में बाब़री विध्वंश हो या गजराला कांड हो प्रभात जी मौके पर जाकर रिपोर्टिंग करते थे। उनके लेख और लेखनी दोनों शानदार थे और ज़ब तक खबर उन्हें स्वयं को अच्छी नहीं लगती तब तक वे लिख-लिख कर पन्ने फाड़ते रहते थे। अच्छे पेन रखने के शौकीन थे और लिबास सिर्फ कुर्ता-पायजामा, इसके अलावा उन्होने कुछ पहना ही नहीं।
 
इतनी कम उम्र में उन्होंने बहुत कुछ हासिल किया, पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, दो बार राज्यसभा के सांसद, पार्टी की पत्रिका कमल सन्देश के सम्पादक भी रहे। उन्होंने इतना परिश्रम किया कि स्वास्थ्य के प्रति ध्यान ही नहीं रखा, या यूँ कहें कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रहे। उनके संबंधों व संपर्कों की सूची बहुत विस्तृत है। भोपाल और ग्वालियर भले ही उनके कर्म क्षेत्र रहे हों, लेकिन पूरे मध्य प्रदेश में उनके परिचित और अनुयायी मौजूद हैं। 
 
प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने पूरे प्रदेश का दौरा किया। हर जिले, मंडल और बूथ स्तर तक कार्यकर्ता से मिलने पहुँचे। वे मुँहफट थे जो भी कहना मुँह पर कहना उनकी ये बात कुछ लोगों को रास नहीं आती थी, लेकिन वे इसी बात के तो “प्रभात झा“ थे। उनकी कार्यशैली और बोलचाल इसीलिये ही विशिष्ट थी। सबसे बड़ी बात तो उनमें यह थी कि वे निडर थे. कैसा भी ताक़तवर आदमी हो उसके ख़िलाफ़ उनके पास ख़बर है तो वो छपेगी ज़रूर और डंके की चोट पर छपती थी। नेता बनने के बाद भी उनमें से पत्रकारिता का स्वभाव नहीं गया था। अपने अभावों को छिपाने की आदत भी उनमें नहीं थी “जो है, सो है“ और सार्वजनिक भी है। पत्रकारिता के दौरान उन्होंने कई बेरोज़गारों को नौकरी दिलवाई, कइयों के घरों के चूल्हे जलवाये। पत्रकारिता के समय ऐसा भी सुयोग था कि ग्वालियर- चंबल संभाग के सभी कलेक्टर, एसपी, आईजी, डीआईजी से जो भी कह दें वो काम होता ज़रूर था। उन्होंने ईमानदारी से पत्रकारिता की तो तत्कालीन अधिकारियों ने उनकी खूब सुनी और उनके जनहित के कामों को प्राथमिकता से किया।  उनमें सीधी और टेडी उँगली से घी निकालने का हुनर भी गज़ब का था।
 
वे सबसे पहिले भाऊ साहब पोतनीस जी के संपर्क में आये, फिर मुखर्जी भवन से जुड़े, इसके बाद स्वदेश से जुड़े और फिर पार्टी में रमे। पोतनीस साहब उनके स्थानीय अभिभावक रहे। संघ कार्यालय में मान. तराणेकर जी, मान. सुरेश जी सोनी, मान. अरुण जी के संपर्क में रहते हुए उनमें संघ के प्रति लगाव और झुकाव बढ़ता गया। मान. कुशाभाऊ ठाकरे जी ने प्रभात जी की राजनीतिक कला-कौशल को पहचाना और उन्हें भोपाल स्थित प्रदेश भाजपा कार्यालय में स्थापित किया।
 
वे जिस काम को भी हाथ में लेते उसकी पूर्णता के लिये बड़ी जीवटता से जुटते, लाभ- हानि की चिंता किये बिना। उनका किसी के लिये सिफ़ारिश करने का तरीक़ा और अंदाज़ सबसे अलग था। जिस अधिकारी या नेता से काम होना होता उससे वे इस लहजे में बात करते थे- “ये काम है, आप ये काम करने की स्थिति में है, आपके हाथ में है और मैं कह सकने की स्थिति में हूँ, किसी का भला करने में कोई दिक़्क़त हो तो मुझे बताइये, कल आप भी इस पद पर नहीं रहेंगे। अतः सतकाम कर ही डालिये, जब आप इस हैसियत में नहीं रहेंगे तो काम करने के लिये आपसे कहेगा भी कौन? “वे अधिकारी के अधिकार-भाव का जागृत करते थे, चेतना को प्रवाहित करते थे। जिस अधिकारी ने काम कर दिया तो फिर उससे संबंधों का निर्वाह जीवन भर करते थे। लोगों की मदद करने के उनके असंख्य उदाहरण और क़िस्से हैं। 
 
ग्वालियर एसपी, डीआईजी और फिर डीजीपी बने स्व. अयोध्यानाथ जी पाठक से पुलिस विभाग के कई अधिकारियों / कर्मियों के तबादलों के साथ- साथ पुलिस से पीड़ित व्यक्तियों को न्याय दिलाने में स्व. प्रभात जी सदैव याद किये जाते रहेंगे। स्व. अयोध्यानाथ जी भी बिहार के होकर उनके सजातीय मैथिल ब्राह्मण थे, दोनों आपस में मैथिल भाषा में ही बात करते थे। स्व. अयोध्यानाथ जी का प्रभात जी से आंतरिक लगाव था, सुदूर बिहार से ग्वालियर आकर जमना और नाम कमाने के कारण प्रभात जी उनके बहुत प्रिय रहे। स्वदेश समाचार-पत्र के माध्यम से बने संबंधों का प्रभात जी ने कभी कोई निजी या पारिवारिक लाभ नहीं लिया। उनकी और उनके परिवार की चिंता करने वाले भी पार्टी, संघ और उनके कई घनिष्ठ यार-दोस्त थे। वे चाहे जितने अभावों में हों लेकिन उन्होंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, उनकी चिंता का चिंतन और निराकरण करने वाले दूसरे ही थे।
 
प्रभात जी का निष्पक्ष और तार्किक विश्लेषण करते समय ये बात भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उन्हें जिनसे भी जो कुछ लिया-दिया हो उन लोगों को भी उन्होंने सब कुछ भरपूर दिया। वे किसी के क़र्ज़दार होकर नहीं गये, वे मैत्रीयता और संबंध निर्वहन का क़र्ज़ सब लोगों पर चढ़ाकर गये। विगत् 25 जुलाई, 2024 के दिन हम सबके प्रिय प्रभात जी हम सबको छोड़ कर अनंत यात्रा पर चले गये। आज स्व. प्रभात झा जी की प्रथम पुण्य तिथि पर उन्हें सादर विनम्र श्रद्धांजली।

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