Sat. Jan 17th, 2026

हथियार का लाइसेंस नागरिक का मौलिक अधिकार नहीं का बड़ा फैसला

ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में हार्दिक कुमार अरोड़ा द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में उन्होंने पिस्टल/रिवाल्वर का अतिरिक्त लाइसेंस न मिलने को चुनौती दी थी।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि हथियार लाइसेंस किसी नागरिक का मौलिक अधिकार नहीं है और इसके लिए उचित कारण और सुरक्षा का खतरा साबित करना आवश्यक है। याचिकाकर्ता हार्दिक कुमार अरोड़ा ने दावा किया था कि वह कृषक है और अपनी आजीविका की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त हथियार लाइसेंस चाहता है। उन्होंने बताया कि अशोकनगर कलेक्टर और कमिश्नर द्वारा उनकी सिफारिश की गई थी।

याचिका में यह भी कहा गया कि उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता रविंद्र दीक्षित ने विरोध करते हुए कहा कि पहले से ही याचिकाकर्ता और उसके परिवार के पास दो लाइसेंस मौजूद हैं एक 315 बोर की बंदूक और दूसरा 12 बोर की।

साथ ही, ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में हथियारों के दुरुपयोग की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा गया कि अतिरिक्त लाइसेंस की कोई आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने कहा कि सिफारिश बिना किसी ठोस आधार के की गई थी और आवेदन में कोई वास्तविक खतरा नहीं बताया गया।

कोर्ट ने सुसंगत कानूनी प्रविधानों का हवाला देते हुए कहा कि लाइसेंस देना या न देना प्रशासनिक विवेकाधिकार है और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक आवेदनकर्ता यह सिद्ध न करे कि उसे किसी व्यक्ति या समूह से खतरा है, तब तक उसे हथियार लाइसेंस का कोई अधिकार नहीं है।

इस आदेश के साथ याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक शांति और सुरक्षा सर्वोपरि है और अदालत लाइसेंसिंग प्राधिकरण के विवेक में दखल नहीं देती।

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