बसंत पंचमी कहीं सरस्वती पूजा, कहीं पतंगबाजी तो कहीं लोकल ‘वैलेंटाइन डे’, जानिए देश के अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाया जाता है वसंतोत्सव
रहा है। ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की आराधना और वसंत ऋतु के आगमन के उल्लास के साथ यह पर्व शिक्षा, संस्कृति और प्रकृति के नवचक्र का प्रतीक माना जाता है। सुबह से ही मंदिरों, विद्यालयों और घरों में पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हो गया है। वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोक उत्सव पर्व के रंग को और गहरा कर देते हैं।
माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर पड़ने वाला यह पर्व न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि क्षेत्रीय परंपराओं, लोक उत्सवों और सांस्कृतिक रंगों से भी भरपूर है। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, पीले फूल चढ़ाते हैं, पीले व्यंजन बनाए जाते हैं और मां सरस्वती को केसरिया हलवा, बूंदी लड्डू और पीले चावल प्रसाद के रूप में अर्पित करते हैं। इसी के साथ अलग अलग स्थानों की परंपराएं और लोकरंग भी इसमें शामिल होते हैं।
बसंत पंचमी: उल्लास और श्रद्धा का पर्व
बसंत पंचमी का त्योहार देश के हर कोने में अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। हर स्थान की अपनी परंपराएं और मान्यताएं हैं। कहीं भव्य सरस्वती पूजा है तो कहीं पतंगबाजी का जोश..कहीं लोक संगीत और नृत्य की धूम है तो कहीं साहित्यिक उत्सव। आइए जानते हैं कि देश के अलग अलग हिस्सों में बसंत पंचमी किस तरह मनाई जाती है।
मध्यप्रदेश में माँ सरस्वती की पूजा
मध्य प्रदेश में बसंत पंचमी मुख्य रूप से माँ सरस्वती की पूजा के रूप में मनाई जाती है। घरों और मंदिरों में सुबह स्नान के बाद पीले या सफेद वस्त्र पहनकर पूजा की जाती है। देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र पर पीले फूल, फल और किताबें चढ़ाई जाती हैं। उज्जैन जैसे पवित्र स्थलों में विशेष आरती और भजन होते हैं। धार के भोजशाला में इस दिन विशेष पूजा की परंपरा है जहां सूर्योदय से सूर्यास्त तक अनुष्ठान होते हैं। इस दिन विद्यार्थी अपनी पुस्तकें और लेखन सामग्री देवी के समक्ष रखकर आशीर्वाद मांगते हैं। यहां प्रसाद के लिए पीला भोजन जैसे हलवा या लड्डू बनाए जाते हैं।
