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दीपिका कुमारी की ओलिंपिक तैयारी:टोक्यो से पहले बनीं वर्ल्ड नंबर वन; जून के आखिरी हफ्ते में आयोजित वर्ल्ड कप में गोल्ड की हैट्रिक बनाई

झारखंड की दीपिका कुमारी पर टोक्यो ओलिंपिक में दुनिया भर के फैन्स की निगाहें टिकी होंगी। ओलिंपिक से ठीक पहले वे वर्ल्ड नंबर वन रैंक पर पहुंच गईं। जून के आखिरी हफ्ते में आयोजित वर्ल्ड कप स्टेज तीन में तीन गोल्ड मेडल पर तीर चलाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचा।

दीपिका टोक्यो में रिकर्व राउंड में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली इकलौती महिला तीरंदाज हैं। उन्होंने वर्ल्ड कप प्रतियोगिताओं में अब तक 9 गोल्ड, 12 सिल्वर और 7 ब्रॉन्ज मेडल जीते हैं। वे तीसरी बार ओलिंपिक में शिरकत करेंगी। उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

ओलिंपिक से पहले वर्ल्डकप स्टेज-3 में गोल्ड की हैट्रिक
ओलिंपिक से पहले दीपिका ने पेरिस में वर्ल्ड कप स्टेज-3 में तीन गोल्ड जीत कर गोल्डन हैट्रिक बनाई। उन्होंने इंडिविजुअल में फाइनल में रूस की एलिना ओसिपोवा को 6-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीता, तो वहीं अंकिता भगत और कोमोलिका बारी के साथ टीम इवेंट में मेक्सिको को 5-1 से हराकर गोल्ड जीतने में कामयाब हुईं। इसके अलावा शादी के बाद पहली बार पति अतनुदास के साथ मिक्स्ड इवेंट में नीदरलैंड के जेफ वान डेन बर्ग और गैब्रिएला शोलेसर से 0-2 से पिछड़ने के बाद वापसी करते हुए 5-3 से जीत हासिल की।

अब 9 साल बाद एक बार फिर दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी बनीं
भारतीय तीरंदाजी के लिए ओलिंपिक से पहले एक खु्शी की बात रही कि दीपिका कुमारी नौ साल बाद एक बार फिर से नंबर वन खिलाड़ी बनीं। इससे पहले वे 2012 में रिकर्व राउंड में नंबर वन खिलाड़ी बनी थीं। दीपिका कुमारी एक इंटरव्यू में कह चुकी हैं कि जब वे सिर्फ 18 साल की थीं, तब वे पहली बार वर्ल्ड नंबर वन पर पहुंची थीं, तब उन्हें वर्ल्ड नंबर वन होने के महत्व के बारे में जानकारी नहीं थी। उन्होंने अपने कोच से इसके बारे में पूछा था।

बचपन में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा
दीपिका को बचपन में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके पिता ऑटो चालक थे और मां नर्स थीं। हालांकि घर की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि आर्चरी के महंगे इक्विपमेंट भी खरीद सकें। वहीं प्रतियोगिता में जाने तक के पैसे नहीं थे। नानी के घर से उन्होंने आर्चरी की शुरुआत हुई।

दीपिका एक इंटरव्यू में बता चुकी हैं कि साल 2007 में जब वो अपने नानी के घर गईं तो उनकी ममेरी बहन ने उन्हें आर्चरी के बारे में बताया और वहां पर खुले अर्जुन आर्चरी एकेडमी की जानकारी दी। जहां पर किट से लेकर खाना तक सब कुछ फ्री था। दीपिका को लगा कि यह बेहतर रहेगा, कि वे आर्चरी की ट्रेनिंग भी कर लेंगी और खाने-पीने तक की भी दिक्कत नहीं होगी। हालांकि उनके पिता ने मना कर दिया, बाद में रांची से करीब 200 किलोमीटर दूर खरसावां स्थित आर्चरी एकेडमी में दीपिका का दाखिला हो गया।

चलते ऑटो में हुआ था जन्म
दीपिका का जन्म सुविधाओं के अभाव में चलते ऑटो में हुआ था। तब शायद उनके माता-पिता को भी यह अहसास नहीं होगा कि एक दिन दीपिका अपना भाग्य खुद लिखेगी। पिता शिव नारायण महतो ऑटो-रिक्शा ड्राइवर के तौर पर काम किया करते थे। जबकि मां गीता महतो एक मेडिकल कॉलेज में ग्रुप डी कर्मचारी हैं। दीपिका ने ओलिंपिक संघ की ओर से बनाई गई एक डॉक्युमेंट्री फिल्म में बताया कि उनका जन्म एक चलते ऑटो में हुआ था। उनकी मां अस्पताल तक नहीं पहुंच पाई थीं।

कॉमनवेल्थ गेम्स में जीत चुकी हैं दो गोल्ड मेडल
दीपिका कुमारी 2010 नई दिल्ली में आयोजित हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में दो गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। उन्होंने इंडिविजुअल और टीम इवेंट में गोल्ड मेडल जीते। इसके अलावा 2010 में भी एशियन गेम्स में टीम इवेंट में ब्रॉन्ज मेडल जीते।

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