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भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष हो या जिलाध्यक्ष दिल्ली से तय नहीं होगा, सबकुछ तय होगा भोपाल धर्मेन्द्र प्रधान के सामने

मध्यप्रदेश में भाजपा पहली बार गुटबाजी का शिकार हो गई है। मंडल अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक गुटबाजी की पहली झलक है, क्योंकि जिलाध्यक्ष की रायशुमारी के बाद बनाये गये 3 या 5 नामों का पैनल किसी को समझ में नहीं आ रहा। सब कहते हैं सबकी बात सुनकर बनाया गया है पैनल, लेकिन निर्णय करेंगे ऊपर वाले। मतलब यह समझ लीजिए कि आपका नाम पैनल में नहीं है, तो फिर गोपनीय ढंग से 3 लोगों की कोर कमेटी ने जिसमें अजय जामवाल, हितानंद शर्मा और शिवप्रकाश तीनों ने मिलकर आपकी योग्यता के बारे में जांच पड़ताल करने के बाद आपकी विश्वसनीयता, निष्ठा और अनुभव तीनों विषय का मैरिट के आधार पर महत्व जरूर देंगे, लेकिन कोई भी मामला दिल्ली से तय नहीं होगा। मीडिया ट्रायल में भले ही आप भोपाल में सुन सकते हैं कि नेता, जिलाध्यक्ष के नाम फाइनल करने के लिए दिल्ली पहुंच गये हैं, लेकिन यकीन कीजिए इस खबर को लिखने तक न मुख्यमंत्री दिल्ली आये न ही संगठन का कोई नेता यहां पहुंचा। मतलब सबकुछ भोपाल में होगा, जब आज-कल में मध्यप्रदेश के प्रभारी केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भोपाल पहुंच जायेंगे। यह बात अवश्य है कि भाजपा हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा और संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा से औपचारिकता वश यह जरूर पूछा है कि सबकुछ तय कर लिया गया है, तो फिर रायशुमारी के बाद भी देरी क्यों हुई, तो जवाब में हितानंद शर्मा ने यह कहां है कि दावेदारों की संख्या ज्यादा थी, इसलिए सुलझाने में समय लगा है, आज निपट जायेगा, देर रात तक घोषणा भी हो जायेगी। जहां तक सवाल है प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव का तो पार्टी हाईकमान में जगतप्रकाश नड्डा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह तीनों की गाइडलाइन है ‘संगठन में संतुलन होना चाहिए, किसी की उपेक्षा नहीं’ और यही फार्मूला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता सुरेश सोनी ने भी अपनाने के लिए मप्र के सभी नेताओं से आग्रह किया है। यूं कहा जाये कि धर्मेन्द्र प्रधान के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वे प्रदेश अध्यक्ष के लिए किसे चुने। सूत्रों का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा की विदाई के पहले प्रदेश का नया अध्यक्ष चुन लिया जायेगा और ब्राह्मण दिल्ली जायेगा तो ब्राह्मण ही नया अध्यक्ष बनकर आयेगा, तो डॉ. नरोत्तम मिश्रा सबसे आगे हैं, लेकिन संतुलन के दृष्टिकोण से ब्राह्मण पुरूष अध्यक्ष बनाने की बजाये महिला ब्राह्मण नेता रीती पाठक की संभावनायें बढ़ जायेंगी और यदि पुरूषों का जोर चला, तो विनोद गोठिया भी बाजी मार सकते हैं। सामान्य वर्ग की अन्य संभावनाओं में बृजेन्द्र सिसोदिया भी परदे के पीछे हैं, परन्तु यदि कोई आदिवासी का नंबर लग गया तो फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे नेता चुन लिये जाये तो आश्चर्य नहीं होगा। रहा सवाल ओबीसी की दावेदारी का तो फिर सागर के भूपेन्द्र सिंह के अनुभवों का पार्टी लाभ उठा सकती है। लेकिन शर्त यह रहेगी कि भूपेन्द्र सिंह शिवराज से अलग हो जाये। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि बकौल प्रदेश भाजपा के मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल की चुप्पी के संकेत हैं कि दिल्ली के सभी बड़े नेताओं की नजर दिल्ली विधानसभा चुनाव पर ही है, जिसका बुखार 8 फरवरी के बाद उतरेगा। इसलिए जिलाध्यक्ष हो या प्रदेश अध्यक्ष सारे फैसलें विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र तोमर के इशारे पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मर्जी के अनुसार पर्यवेक्षक बनकर आये धर्मेन्द्र प्रधान को भोपाल में ही करने पड़ेंगे। ऐसा माना जाये तो चौंकिएगा मत और चौंकिएगा तब जब जिसका नाम पैनल में नहीं होगा उसे भी जिलाध्यक्ष बना दिया जायेगा।

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