तबादलों को लेकर विशेष सहायक की मनमानियों से भड़के मंत्री, पीछे बंधे हैं हाथ, किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दें सुनिए मुख्यमंत्री जी
मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव की सरकार ने लाखों बड़े छोटे शासकीय कर्मचारियों को राहत देेने के लिए शिवराज सरकार के जमाने से लगे चार साल से तबादलों पर प्रतिबंध को एक महिने के लिए खोल दिया था लेकिन मंत्रियों की गुजारिश पर दो बार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तबादलों पर छूट की सीमा 17 दिन बढ़ा दी और कल अंतत: मुख्यमंत्री ने तबादलों पर प्रतिबंध फिर से लागू कर दिया। लेकिन तबादलों से हटे प्रतिबंध का फायदा उन कर्मचारियों को नहीं मिला, जो बेचारे न्याय मांगते 10 से 15 वर्षों से दर-दर भटक रहे हैं। ना पति पत्नी एक स्थान पर पहुंच पाए और ना ही रिटायरमेंट के समय तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों को उनके गृह नगर जाने का मौका मिला। तो फिर सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भलमनसाहत से तबादलों पर हटे प्रतिबंध का फायदा आखिर किसने उठाया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तो मंत्रियों से स्पष्ट कह दिया था कि एक जिले से दूसरे जिले के बाहर तबादलों में मंत्री अपने विभाग में स्वयं स्वतंत्र रहेंगे और जिले के अंदर तबादलों का अधिकार प्रभारी मंत्री के पास होगा लेकिन शर्त होगी कि भाजपा के जिला अध्यक्ष, प्रचारक और संघ की ओर से संगठन मंत्री की सहमति जरूरी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मंत्रियों को अंधेरे में रखकर कुछ विशेष सहायकों ने तो ऐसे-ऐसे तबादले के आदेश जारी करवा लिए जिसमें भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ना तो सहमति है और ना ही मंत्री की सूची को प्राथमिकता है। विशेष सहायक की मनमानी का आलम यह रहा कि राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा जिनके बारे में कहा जाता है कि वे 24 कैरेट के ईमानदार मंत्री हैं। लेकिन वहां पर भी भाजपा समर्थित परिवारों से जुड़े शासकीय कर्मचारियों को न्याय नहीं मिला। मंत्री करण सिंह वर्मा ने तो मुख्यमंत्री से शिकायत भी की। और शिकायत उन्होंने अपने प्रमुख सचिव की भी कर डाली, लेकिन बात नहीं बनी। इंदौर में तुलसी सिलावट के प्रस्तावों पर करण सिंह वर्मा के विशेष सहायक ने नाम ही गायब कर दिए। और तो और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर जब भड़के तब विशेष सहायक की लू उतर गई लेकिन सूत्रों का कहना है कि विशेष सहायक की मनमानी से सैंकड़ों नायब तहसीलदार, आरआई, पटवारी उनके भ्रष्टाचारों से त्रस्त रहे। कमोवेश यही आलम उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के यहां भी दिखा। सूत्रों का दावा है कि राजेंद्र शुक्ला के विशेष सहायक चंद्रप्रताप गोयल ने उप मुख्यमंत्री को जी-जी करके काम नहीं करने दिया। और ऐसे छोटे-छोटे कर्मचारियों को भी ठगने में कोई कसर नहीं छोड़ी। और तो और अपने कक्ष में सैकड़ों नोटशीट लालीपॉप देते हुए बनाई और काम किसी का नहीं हुआ। लेकिन काम उसी का हुआ जिनमें बड़े-बड़े नोटों के उपहार उनके घर पहुंचा दिए। राजेंद्र शुक्ला के बारे में कोई दो राय नहीं है कि वे 24 कैरेट के ईमानदार उपमुख्यमंत्री हैं। उन्हें तो विंध्यांचल का मुख्यमंत्री भी माना जाता है। फिर भी बेचारे ओएसडी के कमरे में बैठने वाले दलालों के चक्कर में उनके साथ न्याय नहीं कर पाए, जिन्हें न्याय मिलना था। और तो और गोयल तो यहां तक कहने से परहेज नहीं किया कि मुख्यमंत्री सचिवालय की परवाह नहीं करता। मैं अपना काम मर्जी से करता हूं लेकिन सच यह है कि इन्हीं लोगों के कारण मंत्रियों को अपने सांसद विधायकों के सामने शर्मिंदा होना पड़ा। एक मंत्री ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि पीछे बंधे हैं हाथ किससे कहें कि पैरों के कांटे निकाल दें। और यह वाक्य सबसे ज्यादा सटीक बैठता है स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप के मंत्रालय में, जहां उनका ओएसडी वीरेंद्र तिवारी मंत्री के ऊपर सबको कह देता है हां हां ठीक है, हो जाएगा। लेकिन हुआ उसका जिस गुरुजी से थैला बटोरा, वरना मजाल है कि संगीता मिश्रा जैसी ईमानदार न्याय के लिए तरस रही वर्ग-2 की शिक्षिका जिनके पति दूरदर्शन भोपाल में, उनका तबादला भोपाल जरूर हो जाता। ऐसे कुछ उदाहरण हैं जिससे कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री के भलमनसाहत से तबादलों में लूट का सारा लाभ मंत्रियों के विशेष सहायकों के चहेतों को मिला, मंत्रियों को नहीं मिला। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि बिना समय गंवाए यदि लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू जैसी जांच एजेंसियां कुछ मंत्रियों के विशेष सहायकों को जांच के निशाने पर ले लें तो पता चल जाएगा कि मुख्यमंत्री की भलमनसाहत से तबादलों की एक महिने 17 दिन की छूट का फायदा न्याय पाने वाले कर्मचारियों को नहीं मिल पाया है तो चौंकिएगा मत।
