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बुरहानपुर के केले को मिला GI टैग, 18 हजार से अधिक किसानों को होगा लाभ, निर्यात प्रोसेसिंग और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे

मध्यप्रदेश के कृषि मानचित्र पर अपनी अलग पहचान रखने वाले बुरहानपुर के केले को जीआई टैग मिल गया है। इसी के साथ जिले के किसानों, व्यापारियों और कृषि आधारित उद्योगों के लिए नए अवसर खुल गए हैं। लंबे समय से चल रहे प्रयासों के बाद मिली यह मान्यता बुरहानपुर के केले को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी विशिष्ट पहचान दिलाएगी।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग के बाद जिले में कोल्ड स्टोरेज, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और फूड प्रोसेसिंग क्षेत्रों में निवेश बढ़ सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी।

बुरहानपुर के केले को मिला GI टैग

बुरहानपुर को लंबे समय से मध्य प्रदेश की “केला राजधानी” के रूप में जाना जाता है। जिले में राज्य की एकमात्र संगठित केला मंडी संचालित होती है, जहां से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में केला देश के विभिन्न राज्यों और विदेशी बाजारों के लिए भेजा जाता है। यहां उत्पादित केला दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में लोकप्रिय है। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन और ईरान जैसे खाड़ी देशों में भी इसकी मांग बनी हुई है।

उत्पादन और खेती के विस्तार की संभावनाएं बढ़ीं

बुरहानपुर जिले में उगाए जाने वाले केले को जीआईएस टैग मिलने के साथ ही जिले की कृषि अर्थव्यवस्था को नई पहचान मिली है। ये प्रदेश का सबसे बड़ा केला उत्पादक जिला है। जिला प्रशासन और कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में लगभग 18,640 किसान केले की खेती से जुड़े हैं। करीब 26 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में केले की खेती की जा रही है, जिससे हर वर्ष लगभग 18 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा उत्पादन होता है। केला यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है और हजारों परिवारों की आजीविका इसी पर निर्भर है।

उत्तर भारत से लेकर खाड़ी देशों तक मांग

बुरहानपुर को लंबे समय से मध्य प्रदेश की “केला राजधानी” के रूप में जाना जाता है। जिले में राज्य की एकमात्र संगठित केला मंडी संचालित होती है, जहां से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में केला देश के विभिन्न राज्यों और विदेशी बाजारों के लिए भेजा जाता है। यहां उत्पादित केला दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में लोकप्रिय है। साथ ही संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन और ईरान जैसे खाड़ी देशों में भी इसकी मांग बनी हुई है। इसकी गुणवत्ता, स्वाद और लंबी दूरी तक परिवहन की क्षमता के कारण व्यापारियों के बीच इसकी अच्छी मांग रहती है। जिले की भौगोलिक स्थिति और परिवहन नेटवर्क ने भी इसे बड़े कृषि व्यापार केंद्र के रूप में विकसित किया है। यहां का केला “वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट” (ODOP) योजना के तहत चयनित उत्पाद भी है।

GI टैग से क्या बदलेगा

जीआर टैग किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि दूसरे क्षेत्रों के उत्पाद उसी नाम से बाजार में नहीं बेचे जा सकते। इससे मूल उत्पादकों के हित सुरक्षित होते हैं और उपभोक्ताओं को प्रमाणिक उत्पाद मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार जीआई टैग मिलने के बाद उत्पाद की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है, प्रीमियम बाजारों तक पहुंच आसान होती है और निर्यात में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलती है।

प्रोसेसिंग उद्योगों को भी मिलेगा लाभ

बुरहानपुर में केले की खेती सिर्फ फल उत्पादन तक सीमित नहीं है। यहां प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के अंतर्गत जिले में 55 से अधिक केला प्रोसेसिंग इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं। इन इकाइयों में केला चिप्स, पाउडर, पल्प और अन्य मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा केले के तनों से फाइबर निकालकर हस्तशिल्प सामग्री, टोकरी, पर्स और सजावटी वस्तुएं भी बनाई जा रही हैं। GI टैग मिलने से इन उत्पादों की बाजार स्वीकार्यता और मांग बढ़ने की उम्मीद है।

Shruty Kushwaha
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