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बेहाल शहर का अनुरोध हे मोहन आप ग्वालियर का प्रभार सम्हालें

ग्वालियर। इन दिनों ग्वालियर की सड़कों की पूरे देश में चर्चा हो रही है। छोटा शहर रूतबा महानगर का और स्मार्ट शहरों की गिनती में आने वाला ग्वालियर अब अपनी बदहाली पर रो रहा है। नेताओं और प्रशासनिक अधिकारी खंड खंड ग्वालियर को देख रहे हैं, लेकिन कोई सकारात्मक पहल अब तक नहीं की गई है। सड़कें दिन प्रतिदिन ओर बदहाल हो रही है। वहीं सड़कों की खस्ताहाल हालत के कारण जाम की समस्या भी गहरा गई है। छोटी और निचली कालोनियां अतिवर्षा के कारण आज तक डूब में है। प्रशासन सिर्फ खानापूर्ति में लगा है। पाश सड़कों की हालत को दिनभर निगम और प्रशासन के अधिकारी अपनी शीशा लगी गाड़ी से देखकर निकल जाते है और आमजन की उम्मीदों को तोड़ देते है। वहीं ग्वालियर में सत्तारूढ सरकार से दो मंत्री, सांसद, केन्द्रीय मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष से लेकर कई दिग्गज है। लेकिन सब अपनी ढपली अपना राग अलापते फिरते है। ग्वालियर की सड़कों की खंड खंड हालत की किसी को कोई फिक्र दिखाई देती नहीं है।
ग्वालियर में समय से पहले आये मानसून और फिर अतिवर्षा के बाद पहले से ही खंड खंड सड़कों की हालत ओर बदतर हो गई है। पूरे शहर की सड़कें जगह जगह से क्षतिग्रस्त हो गई है। कई कई बड़े बड़े और गहरे गहरे गड़ढे हो गये है। इसमे अगर कोई वाहन चला जाये तो चालक की जान पर आ रही है। लेकिन ग्वालियर में बैठे प्रशासन के अधिकारियों और राजनेताओं को आमजनों की चिंता नहीं है। क्योंकि ग्वालियर में राजनेता सड़कों की चिंता तो जताते है, लेकिन निरीक्षण तक सीमित होकर रह जाते है। इसके बाद सड़कों का कायाकल्प करने की बात को भूल जाते है। ग्वालियर को महानगर और स्मार्ट सिटी का दर्जा प्राप्त है। लेकिन ग्वालियर की सड़कें और यातायात मैनेजमेंट इसे किसी भी तरह से स्मार्ट की तरजीह नहीं दे सकता है। भले ही कागजों और स्मार्ट शहर के अधिकारी इसे स्मार्ट मानें। जनता तो सिर्फ आज भी मूलभूत समस्याओं के लिये संघर्षरत है और निगम को अपना टैक्स भी बुनियादी सुविधाओं के लिये देती है। परंतु यह टैक्स कहां लगता है इसका अता पता नहीं है, क्योंकि यह सड़क पर तो फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा है। ग्वालियर में नगर निगम, स्मार्ट सिटी कारपोरेशन, कलेक्ट्रेट प्रशासन जैसी सर्विसंग बाडियां हैं, लेकिन इनकी सर्विस आज इस बदहाल शहर की हालत पर आंखें तरेर रही है। ग्वालियर से प्रदेश और देश की सरकार में काफी प्रतिनिधित्व भी है। यहां से प्रदेश सरकार में दो मंत्री, एक विधायक, एक सांसद, एक केन्द्रीय मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष समेत सत्तारूढ पार्टी के दिग्गज नेता शामिल हैं। वहीं प्रभारी मंत्री का दखल भी ग्वालियर में रहता है। लेकिन इतने बड़े नेताओं के अमले के बाद भी कायाकल्प की बांट ही ग्वालियरवासी देख रहे हैं। नेता भी सिर्फ निरीक्षण तक सीमित होकर रह गये है या फिर सड़कें धंसने के बाद इक्का दुक्का अधिकारियों को लापरवाह मानकर सस्पेंड कर देते हैं। लेकिन इसके आगे जो जमीन पर काम होना है वह होता दिखाई नहीं दे रहा है। नेता बस हसीन सब्जबाग दिखाकर चले जाते है। प्रभारी मंत्री भी समय समय पर अपने नेता के दौरे के दौरान आकर बैठकें और निरीक्षण तक सीमित होकर रह गये है। सड़कों की समस्या जस की तस सीमित है और दिन प्रतिदिन गहराती जा रही है। 
अब उम्मीदें सिर्फ आमजन को सूबे के मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव से है। वह ही ग्वालियर पर ध्यान देकर इसे गोद ले लें तो कुछ हो सकता है। नहीं तो यहां तो नेता भी सिर्फ प्रशासनिक अमले को आये दिन दिशा निर्देश देकर अपना पल्ला झाड़ लेते है। प्रशासन के आला अधिकारी बैठक और निरीक्षण तक ही सीमित होकर रह जाते है। आगे क्या होना है इसका किसी को कुछ नहीं पता। पाश सड़कें शिंदे की छावनी, पड़ाव चैराहा, स्टेशन बजरिया, महाराज बाड़ा, दौलतगंज, फालका बाजार, नया बाजार, नई सड़क, चेतकपुरी, मुरार, हजीरा की सड़कें अब जबाब देने लगी है। चेतकपुरी की नई सड़क तो पहली, दूसरी बारिश में ही ढह गई थी। यह मामला गर्माने के बाद दो इंजीनियरों को सस्पेंड भी किया गया था। सवाल यह है कि इंजीनियरों के सस्पेंशन से क्या हालात सुधर गये है। सड़कें दिन प्रतिदिन और बदहाल होती जा रही है। इसे पूरा प्रशासन और मंत्री संतरी भी अपनी आंखों से देख रहे है। अब ग्वालियर की हालत देखकर लोग कहने लगे है कि मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ग्वालियर का प्रभार तुलसीराम सिलावट से अपने हाथ में लें, प्रभारी मंत्री सिलावट ग्वालियर की व्यवस्था सम्हाल नहीं पा रहे हैं। 

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