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सलाम है नारी की हिम्मत को ! जिस श्मशान में जाना है वर्जित वहां की पूरी जिम्मेदारी अकेले संभालती हैं संतोषी

 हिंदू धर्म में आम तौर पर महिलाओं का श्मशान में जाना वर्जित माना जाता है,लेकिन राजनांदगांव के श्मशान में एक महिला ही पूरे श्मशान का जिम्मा उठा रही हैं. आप ये जानकर थोड़ा और चौंक जाएंगे कि ये महिला बीते 22 सालों से अपने काम को अनवरत अंजाम दे रही हैं. सामाजिक कुरीतियों को पीछे छोड़ कर अपने काम में जुटी इस महिला का नाम है संतोषी ठाकुर. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आइए जानते हैं संतोषी ठाकुर की कहानी जो समाज की वर्जनाओं को तोड़ कर अपना अलग मुकाम बना चुकी हैं.

साल 2002 से ही कर रही हैं श्मशान में काम

आपने अक्सर सुना होगा कि महिलाएं अगर ठान लें तो कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, कठिन से कठिन काम को भी वो आसानी से कर सकती हैं.कुछ ऐसी ही कहानी है संतोषी ठाकुर की. संतोषी ठाकुर ने NDTV को बताया कि वो साल 2002 की बात थी. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी. ऐसे में उन्होंने भी काम करने का फैसला किया लेकिन कोई और हुनर न होने की वजह से उन्होंने मठपारा स्थित मुक्तिधाम श्मशान में काम करने का फैसला किया. शुरुआती दौर में वो श्मशान में छोटा-मोटा काम ही करती थी. शुरू के 10 साल तक तो ऐसा ही चला लेकिन बाद में पूरे श्मशान की जिम्मेदारी उन्होंने उठा ली.

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के श्मशान घाट में संतोषी ने कोरोना काल के दौरान भी शवों को खुद से ही जलाया. एक दशक से अधिक वक्त से वो पूरे श्मशान की जिम्मेदारी संभाल रही है.

आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए शुरू किया काम

संतोषी बताती हैं कि उनकी शादी के बाद घर की स्थिति अच्छी नहीं थी. बच्चा होने के बाद आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई. पति की कमाई से घर नहीं चलता था. इसी दौरान सास-ससुर ने भी घर से निकाल दिया. जिसके बाद वो पति के साथ किराए के घर में रहने लगी. इसी दौरान  पड़ोस की महिला ने बताया था कि श्मशान घाट में सहायक का काम है. संतोषी ने इस काम को करने का ठाना और पति ने भी साथ दिया. उस समय उनका बच्चा इतना छोटा था कि ठीक से चल भी नहीं पाता था. इन परिस्थितियों में उन्होंने काम करना शुरू किया. वे स्वीकारती हैं कि पहले थोड़ा खराब लगता था लेकिन अब आदत हो गई है. अब तो दूसरी महिलाएं उनसे बोलती हैं कि आपकी हिम्मत हमें भी प्रेरणा देती है.

संतोषी मठपारा स्थित श्मशान घाट में अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी बड़ी शिद्दत से निभाती हैं. शवों को जलाने के बाद सफाई और दूसरे काम भी अकेले ही बखूबी अंजाम देती हैं.

 कोरोना काल में भी शवों को जलाया

संतोषी मठपारा इलाके में ही रहती हैं. उन्होंने बताया कि उनके परिवार में पति के अलावा दो बच्चे भी हैं. अब सभी को उनके काम की आदत हो गई है. शुरू में उन्हें ताने मिलते थे कि महिलाओं को तो श्मशान में जाने भी नहीं दिया जाता और वो वहां काम कर रही हैं. लेकिन अब वो आत्मनिर्भर हो गई हैं. अब उनको कोई ताने भी नहीं देता. अब वे श्मशान में आने वाले शवों की एंट्री करती हैं, जलाने का काम करती हैं और साथ ही साथ श्मशान के मेंटनेंस का भी काम करती है. कोरोना के समय भी उन्होंने बेझिझक और निडर होकर शवों का अंतिम संस्कार किया. उस दौरान कई शवों को उन्होंने खुद ही जलाया भी था. संतोषी इसके साथ ही महिलाओं को भी जागरूक कर रही हैं. वो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हैं. वो कहती हैं कि समाजिक कुरीतियों की परवाह न करें और अपने काम में जुट जाएं, सफलता जरुर मिलेगी.

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