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ग्वालियर के कुलैथ में निकलती है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा 180 साल से चली आ रही अनसर परंपरा; भोग के बाद 4 हिस्सों में बंट जाता है घड़ा अरुण मोरे। ग्वा

भगवान जगन्नाथ का नाम आते ही सबसे पहले ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध पुरी धाम और वहां की भव्य रथयात्रा की छवि सामने आती है। लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि तानसेन की नगरी ग्वालियर से महज 17 किलोमीटर दूर स्थित कुलैथ गांव भी भगवान जगन्नाथ की अद्भुत परंपराओं का साक्षी है।

अंचल में ‘मिनी पुरी’ या ‘छोटा पुरी’ के नाम से प्रसिद्ध इस गांव में करीब 180 वर्षों से महाप्रभु जगन्नाथ उसी शुद्ध परंपरा, नेम-नियम और सात्विक श्रद्धा के साथ विराजमान हैं। यहां रथयात्रा से पहले भगवान के एकांतवास (अनसर) में जाने की परंपरा निभाई जाती है।

वहीं, भोग अर्पित करते ही मिट्टी के पात्र का चार हिस्सों में टूट जाना आज भी  श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आश्चर्य का विषय बना हुआ है। ये परंपराएं देशभर के श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

9 साल के बालक की जिद से शुरू कहानी मंदिर के वर्तमान पुजारी किशोरीलाल श्रीवास्तव बताते हैं कि कुलैथ की ‘मिनी पुरी’ की स्थापना के पीछे एक नौ वर्षीय अनाथ बालक की मार्मिक लोककथा जुड़ी है। उनके अनुसार, वर्ष 1807 में कुलैथ निवासी सांवलेदास के माता-पिता का असमय निधन हो गया।

परिजनों ने उसे सांत्वना देने के लिए कहा कि उसके माता-पिता भगवान जगन्नाथ के धाम पुरी चले गए हैं। मासूम ने इसे सच मान लिया और उनसे मिलने की जिद ठान ली।

महज 9 साल की उम्र में वह दंडवत (लेटकर) यात्रा करते हुए पुरी के लिए निकल पड़ा। यहीं से शुरू हुई वह आस्था की यात्रा, जो आगे चलकर कुलैथ में ‘मिनी पुरी’ की स्थापना का आधार बनी।

7 दंडवत यात्राओं के बाद कुलैथ पहुंचे महाप्रभु मंदिर की मान्यता के अनुसार, पुरी की यात्रा के दौरान सांवलेदास की मुलाकात संत रामदास महाराज से हुई। बालक की अटूट भक्ति से प्रभावित होकर संत ने कहा कि यदि वह सात बार दंडवत करते हुए पुरी की यात्रा पूरी करेगा तो भगवान जगन्नाथ स्वयं उसे दर्शन देंगे।

सांवलेदास ने कई वर्षों तक कठिन तप और साधना के साथ यह संकल्प पूरा किया। वर्ष 1844 की यात्रा के दौरान महाप्रभु ने स्वप्न में दर्शन देकर कुलैथ में अपनी स्थापना का आदेश दिया। दो वर्ष बाद 1846 में उन्हें फिर स्वप्न आया कि गांव के पास बहने वाली सांक नदी में चंदन की दिव्य मूर्तियां तैर रही हैं।

सांवलेदास ने नदी से उन मूर्तियों को निकालकर अपने घर में स्थापित किया। बाद में यही स्थान भगवान जगन्नाथ के मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ और कुलैथ को ‘मिनी पुरी’ की पहचान मिली।

भोग लगते ही चार हिस्सों में बंट जाता है पात्र कुलैथ स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की सबसे चर्चित परंपरा महाप्रसाद से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान को मिट्टी के पात्र में तैयार भात (चावल) का भोग अर्पित किया जाता है। जैसे ही यह पात्र गर्भगृह में महाप्रभु के समक्ष रखा जाता है, वह अपने आप चार बराबर हिस्सों में विभाजित हो जाता है।

मंदिर से जुड़े लोग और श्रद्धालु इसे भगवान जगन्नाथ की दिव्य कृपा और जीवंत उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के लिए कौतूहल और अटूट आस्था का विषय बनी हुई है।

सिंधिया राजघराने और अंग्रेजों ने भी परखी थी परंपरा स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, कुलैथ मंदिर में भोग के पात्र के अपने आप चार हिस्सों में विभाजित होने की चर्चा जब दूर-दूर तक फैली, तो सिंधिया शासनकाल में तत्कालीन शासक और अंग्रेज अधिकारियों ने इसकी सत्यता परखने का प्रयास किया। मान्यता है कि इस बार मिट्टी के बजाय पीतल के ठोस पात्र में चावल का भोग तैयार कर भगवान के समक्ष रखा गया।

लोककथाओं के अनुसार, वह पीतल का पात्र भी चार बराबर हिस्सों में टूट गया। बुजुर्गों का कहना है कि उन चार हिस्सों में से एक सिंधिया राजघराने के संग्रह में, दूसरा अंग्रेज अपने साथ ब्रिटेन ले गए, तीसरा आज भी कुलैथ मंदिर में सुरक्षित है, जबकि चौथे हिस्से के पुरी धाम में होने की मान्यता प्रचलित है। हालांकि, इन दावों के स्वतंत्र ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

रथयात्रा में ‘मिनी पुरी’ बन जाता है कुलैथ गांव हर वर्ष आषाढ़ मास में कुलैथ में पुरी की परंपरा के अनुरूप भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। तीन दिन तक चलने वाले इस आयोजन में मध्य प्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

रथयात्रा के दौरान पूरा गांव उत्सव के रंग में रंग जाता है। घर-घर मेहमानों का आगमन होता है और धार्मिक आयोजनों की धूम रहती है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग विशेष इंतजाम करते हैं।

भीड़ की निगरानी के लिए सीसीटीवी और ड्रोन कैमरों का उपयोग किया जाता है, जबकि आपात स्थिति से निपटने के लिए एम्बुलेंस और मेडिकल टीमें तैनात रहती हैं।

भले ही मंदिर से जुड़ी कई मान्यताओं के आधुनिक वैज्ञानिक या लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन करीब 180 वर्षों से चली आ रही ये परंपराएं ग्वालियर अंचल में भगवान जगन्नाथ के प्रति गहरी लोक-आस्था को दर्शाती हैं।

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