अघोरी किन्नर ने चिता से मांस निकालकर क्यों खाया वीडियो में जो दिखा, क्या वह साधना है; अघोरी श्मशान में करते क्या हैं?
उज्जैन के चक्रतीर्थ श्मशान का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो सवाल सिर्फ वीडियो में दिख रहे मंजर का नहीं रहा, बल्कि अघोर साधना की उस परंपरा पर भी उठ गया, जिसके नाम पर यह सब किया गया।
सवाल 1- वायरल वीडियो में आखिर दिख क्या रहा है, और काली है कौन?
जवाब- वीडियो में जो दिख रहा है, वह सामान्य धार्मिक अनुष्ठान नहीं है।
- वीडियो किन्नर अखाड़े से जुड़ी काली उर्फ नंद गिरि के इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर हुआ। इसमें वह तलवार लेकर उज्जैन के चक्रतीर्थ श्मशान घाट पहुंचती है, कुछ मंत्र बोलने के बाद जलती चिता में तलवार डालती है, और कथित तौर पर कोई सामग्री निकालकर खाती दिखती है। अघोरी काली वीडियो में उसे गर्म और स्वादिष्ट भी बताती है।
- काली नंद गिरि किन्नर अखाड़े से जुड़ी हैं, जो ट्रांसजेंडर समुदाय द्वारा बनाया गया एक मान्यता प्राप्त अखाड़ा है, जिसकी स्थापना 2015 में हुई और जो जूना अखाड़े के संरक्षण में आता है। यह उनका पहला विवाद नहीं है।
- मई 2026 में काली ने अपनी गुरु और अखाड़े की महामंडलेश्वर सतीनंद गिरि से सार्वजनिक तौर पर नाता तोड़ लिया था, जिसके बाद गुरु-शिष्य परंपरा तोड़ने के आरोप में उन्हें अखाड़े की सदस्यता और महामंडलेश्वर पद से बर्खास्त कर दिया गया था। हालांकि, वे खुद को अब भी महामंडलेश्वर बताती हैं।
सवाल 2- अघोर परंपरा क्या है, और श्मशान साधना क्यों होती है?
जवाब- ‘अघोर’ का शाब्दिक अर्थ है, जो घोर यानी डरावना न हो।
- अघोर परंपरा हिंदू धर्म की शैव धारा की एक शाखा मानी जाती है, जिसमें शिव को ही पहला अघोरी माना जाता है। इतिहास में इसकी जड़ें कापालिक जैसे प्राचीन शैव संन्यासी संप्रदायों से जोड़ी जाती हैं, जो श्मशान, खोपड़ी और कठोर तांत्रिक साधनाओं से जुड़े रहे।
- विद्वान यह सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं कि कापालिक परंपरा और आज की अघोर परंपरा को पूरी तरह एक जैसा मान लेना ठीक नहीं, दोनों में समय और स्वरूप का बड़ा फासला है। आधुनिक अघोर परंपरा को संगठित रूप देने का श्रेय बाबा कीनाराम को जाता है।
- बाबा कीनाराम का जीवनकाल 17वीं-18वीं सदी का माना जाता है (उनकी समाधि 1771 में हुई), और जो वाराणसी के क्रीं-कुंड आश्रम से जुड़े हैं। यह आश्रम आज भी अघोरियों का सबसे बड़ा तीर्थ केंद्र है, यह कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए भी जाना जाता है।
- श्मशान इस परंपरा के केंद्र में इसलिए है क्योंकि अघोर दर्शन मानता है, जब तक मृत्यु के भय से मुक्ति नहीं मिलती, मोह-माया से भी मुक्ति नहीं मिलती। इंदौर के तांत्रिक पंडित जयदीप दुबे का कहना है- ‘श्मशान साधना में यह सोचना होता है कि आज नहीं तो कल हम भी इसी चिता के पात्र बनेंगे। यह एकांत में बैठकर खुद को यह याद दिलाने की साधना है कि सब कुछ नश्वर है, न कि किसी को दिखाने या डराने के लिए की जाने वाली क्रिया।’
- उज्जैन के औघड़ साधक राजनाथ पंपी कहते हैं, ‘हम औघड़ में आते हैं, हमारी साधनाएं समाज के प्रति अनुकूलता को देखते हुए होती हैं, जन-कल्याण और जन-हित के लिए। यह गुप्त साधना होती है, ये सब क्रियाएं दिखाई नहीं जातीं।’
सवाल 3- तो क्या मानव अवशेष खाना अघोर साधना का हिस्सा है?
जवाब- नहीं। अघोर साधकों के मुताबिक, इसे अघोर साधना का हिस्सा नहीं माना जाता।
- महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरि के मुताबिक, तंत्र साधना की क्रियाओं को गोपनीय रखना ही परंपरा का हिस्सा है। सार्वजनिक रूप से इस तरह का प्रदर्शन अघोर परंपरा के विपरीत है। उनका कहना है कि आधुनिक समाज में मानव मांस खाने जैसी हरकत को नरपिशाची प्रवृत्ति के तौर पर देखा जाना चाहिए, परंपरा के तौर पर नहीं।
- अघोरी अखाड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़ेश्वरी अघोरी बाबा विष्णुनाथ ने भी इसे परंपरा का हिस्सा मानने से इनकार किया है और इसी मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।
- उज्जैन के अघोर साधक राजनाथ पंपी कहते हैं, ‘जो इन्होंने करा है वो बड़ा गलत है, कोई भी चिता से खिलवाड़ नहीं करता। जो साधक होता है वो अपनी साधना में लीन रहता है।’ उनके मुताबिक तंत्र को लेकर समाज में पहले से कई भ्रांतियां फैली हैं। कई लोग सिर्फ काला कपड़ा पहनकर खुद को तंत्र साधक बताने लगते हैं, जबकि असली साधना से उनका कोई लेना-देना नहीं होता।
- इंदौर के तांत्रिक साधक पंडित जयदीप दुबे का कहना है, ‘हमारे किसी भी शास्त्र या वेद में यह नहीं लिखा कि अघोर साधना के लिए मांस खाना जरूरी है, वह भी मानव मांस। जो ऐसा कर रहा है, वह गुरु के मार्गदर्शन से भटक चुका है।’ उज्जैन के ही तांत्रिक साधक आनंद जी भी कहते हैं कि मानव अवशेष खाना किसी शास्त्र-पुराण में अघोर साधना के तौर पर नहीं लिखा है।
तो फिर साधना से जुड़ा नहीं होने के बावजूद ऐसा करने की वजह क्या हो सकती है?
- राजनाथ पंपी इसे दिखावे और सुर्खियों में बने रहने की से जोड़ते हैं। उनका कहना है, ‘इनको तो बस हाईलाइट होना है, चाहे जैसे भी।’ आनंद जी के मुताबिक, आज खुद को हाईलाइट करने की होड़ में इस तरह के कृत्य किए जाते हैं। वे इसे ज्ञान की कमी, आपसी प्रतिस्पर्धा और फेम पाने की कोशिश का नतीजा मानते हैं।
जवाब- पुलिस ने इसे सिर्फ धार्मिक विवाद नहीं माना है, FIR दर्ज कर अघोरी काली की गिरफ्तारी हो चुकी है।
- अघोरी अखाड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णुनाथ की शिकायत के बाद उज्जैन के जीवाजीगंज थाने ने काली नंद गिरि के खिलाफ BNS की धारा 301 और आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया है। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।।
- धारा 301 श्मशान या अंत्येष्टि स्थल में अनधिकार प्रवेश, तोड़-फोड़ या मानव शव की अवहेलना से जुड़ी है, सजा के तौर पर एक साल तक कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
- अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र पुरी महाराज ने उज्जैन SP प्रदीप शर्मा से बात कर सख्त कार्रवाई की मांग की, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि ने भी पत्र लिखकर कहा कि मानव अंगों का सेवन किसी भी शास्त्र में नहीं लिखा, और साधु-संतों का भेष धारण कर ऐसा कृत्य करने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
सवाल 5- FIR के बाद अब आगे क्या होगा?
जवाब- अब पुलिस वीडियो, चिता और उससे जुड़े साक्ष्यों की जांच करेगी।
- पहला वीडियो हटाए जाने के बाद काली नंद गिरि ने चक्रतीर्थ श्मशान से ही एक दूसरा वीडियो पोस्ट किया था। इसमें वह शरीर पर राख मलती दिखती हैं और आलोचना करने वालों को चुनौती देती हैं। वीडियो में वह किसी को नुकसान पहुंचाने की बात भी कहती हैं।
- इन बयानों को लेकर भी पुलिस के सामने शिकायत या अलग कानूनी कार्रवाई का सवाल उठ सकता है। इस पर कौन-सी धाराएं लागू होंगी, यह वीडियो की पूरी सामग्री और पुलिस की जांच पर निर्भर करेगा।
- जांच में पुलिस वायरल वीडियो की सत्यता, उसके मूल स्रोत और उससे जुड़े दूसरे साक्ष्यों की पड़ताल करेगी। सबसे अहम बात यह होगी कि चिता से वास्तव में क्या निकाला गया था और उसके साथ किस तरह की छेड़छाड़ हुई।
- अगर जांच में चिता से मानव अवशेष से छेड़छाड़ की पुष्टि होती है, तो उसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई होगी। वहीं, वीडियो में दिखाई गई चीज की प्रकृति और पूरे घटनाक्रम का वास्तविक संदर्भ जांच के बाद ही साफ होगा।
- कहा जाता है कि करीब 350 साल पहले महाराजा छत्रसाल के गुरु महामति प्राणनाथ ने उन्हें बताया था कि पन्ना की धरती के नीचे हीरे दबे हैं। इसी के बाद पन्ना में पहली खदान खुदी और तब से पन्ना हीरे की खान के तौर पर मशहूर है, और आज भी यहां कोई भी नागरिक 200 रुपए का पट्टा लेकर खुदाई शुरू कर सकता है।
