स्तन कैंसर के इलाज के दुष्प्रभाव को नए प्रोग्नोस्टिक टेस्ट से कम करें, लेकिन शीघ्र डायग्नोज होना महत्वपूर्ण
भोपाल: आक्रामक कीमोथेरेपी इलाज से लेकर रेडिएशन थेरेपी कराने तक स्तन कैंसर मरीजों को बीमारी से निजात पाने के लिए मुश्किल तथा दुर्बल कर देने वाले इलाज प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। हालांकि नए जमाने के प्रोग्नोस्टिक टेस्ट से बहुत सारे स्तन कैंसर के मरीज अब कीमोथेरेपी कराने से बच सकते हैं और अपने जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं।
कैनअसिस्ट ब्रेस्ट जैसे प्रोग्नोस्टिक टेस्ट से शुरूआती चरण के स्तन कैंसर मरीज में बीमारी के खतरे का आकलन कर सकते हैं जिससे कि उनको कीमोथेरेपी कराने की जरुरत है या नहीं, डाक्टर इसके बारें में उनको सूचित कर सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ईएसएमओ, एनसीसीन और एएससीओ जैसी टॉप की अंतरराष्ट्रीय ऑन्कोलॉजी संस्था आज के समय में कीमोथेरेपी के इस्तेमाल के लिए पहले प्रोग्नोस्टिक टेस्ट करने की सलाह देते हैं। ऑन्कोलॉजिस्ट का कहना है कि प्रोग्नोस्टिक टेस्ट की पहुँच ज्यादा से ज्यादा मरीजों तक कराने की जरुरत है, इससे वे बीमारी के परिणाम में सुधार कर सकते हैं और स्वास्थ्य संबंधी संसाधन के इस्तेमाल को कस्टमाइज कर सकते हैं इसके अलावा वे मरीजों की जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार कर सकते हैं।
लेक सिटी हॉस्पिटल, भोपाल के प्रमुख ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ रवि गुप्ता ने कहा, “हाल के वर्षों में स्तन कैंसर इलाज के तौर-तरीके बहुत एडवांस हुए है और हम हर मरीज में इलाज को अनुकूलित करने में सफल हुए है। पहले हर तरह के मरीजों को एक ही तरह के इलाज को कराना पड़ता था और इस तरह के इलाज में कठिन कीमोथेरेपी परहेज शामिल होता था, यह बहुत कमजोर कर देने वाली प्रक्रिया होती है। हालांकि आज के समय में कैनअसिस्ट ब्रेस्ट जैसे प्रोग्नोस्टिक टेस्ट के साथ-साथ हार्मोन रिसेप्टर टेस्ट्स कराने से डॉक्टर सफलतापूर्वक यह पता लगा लेते हैं कि किन मरीजों का इलाज बिना कीमोथेरेपी से बेहतर हो सकता है। इससे कई मरीजों में ओवर-इलाज को न कराने में मदद मिलती है, इससे बेहतर परिणाम मिलता है और मरीज के जीवन की गुणवत्ता भी सुधरती है।”
कीमोथेरेपी ड्रग्स शरीर में बढ़ती हुई कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को ख़त्म करने में मददगार होती है, लेकिन ये ड्रग्स स्वस्थ बॉडी सेल्स पर भी बुरा असर डालती है। इससे बालों का झड़ना, चक्कर आना, डायरिया, भूख की कमी और अन्य पेट संबंधी समस्याओं के साथ-साथ गंभीर मांसपेशी, हार्ट तथा हेमोटोलोजिकल समस्याएं जैसे साइड इफेक्ट भी सामने आते है।
कम खतरे वाले मरीजों के पास यह मौका होता है कि वे कीमोथेरेपी से बच सकते हैं, यह उनमे दुबारा कैंसर होने के बहुत कम चांस पर निर्भर होता है। भारत में विकसित कैनअसिस्ट ब्रेस्ट एक ऐसा सस्ता प्रोग्नोस्टिक टेस्ट है जो ज्यादा और कम खतरे का संकेत बेहतर सटीकता के साथ देता है। दुर्भाग्यवश रूप से भारत में बहुत सारे मरीज इस तरह के टेस्ट का फायदा बीमारी के शुरुआती चरण में नहीं उठा पाते हैं।
डॉ गुप्ता ने आगे कहा, “कीमोथेरेपी और आक्रामक इलाज को न कराने से न केवल मरीज की जिंदगी सुधरती है बल्कि इलाज में होने वाले खर्च में बचत होती है। इस तरह के प्रोग्नोस्टिक टेस्ट को सरकारी सब्सिडी और इंसेंटिव के जरिये भारतीय कंपनियों को ऐसे टेस्ट ज्यादा से ज्यादा मरीजों के लिए उपलब्ध कराने की जरुरत है। सबसे जरूरी चीज यह है कि इस बीमारी का शुरूआती चरण में पता चलना बहुत जरूरी है। अंतिम चरण में डायग्नोज होने से मरीज इस तकनीक से फायदा नहीं उठा सकता है। दुर्भाग्यवश रूप से वर्तमान में भारत में स्तन कैंसर के ज्यादातर मरीज अंतिम चरण में डायग्नोज किये जाते हैं।”
मध्य प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में स्तन कैंसर के ममाले बढ़े हैं। स्क्रीनिंग प्रोग्राम की कमी, जागरूकता की कमी, अंतिम स्टेज में इस कैंसर से डायगनोज होना अभी भी महत्वपूर्ण चिंता बनी हुई है। राज्य में 60% से ज्यादा मरीज स्टेज 3 या स्टेज 4 में बीमारी से डायग्नोज किये जाते हैं।
प्रोग्नोस्टिक टेस्ट से लाभ लेने के अलावा स्टेज 1 या 2 में डायग्नोज किए गए मरीज ब्रेस्ट-कंजर्विंग सर्जरी (स्तन-संरक्षण सर्जरी) (BCS) करा सकते हैं और मास्टेक्टॉमी के मनोवैज्ञानिक तनाव से बच सकते हैं।
इस बीमारी के सम्बन्ध में फैली अफवाहों को ख़त्म करने, महिलाओं को इस रोग को शुरुआती स्टेज में पता लगाने हेतु शिक्षित करने और वार्षिक स्क्रीनिंग प्रैक्टिस को स्थापित करना समय की मांग है।
