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कांग्रेस भी कमेटियों को लेकर मौन, भाजपा गुटबाजी में उलझी; सभापति को अपनों की नाराजगी की चिंता, आम जनता हो रही परेशान

बांसवाड़ा नगर परिषद में 20 माह बाद भी भाजपा उसका प्रतिपक्ष नेता नहीं चुन सकी है। खुद सत्ताधारी कांग्रेस बोर्ड भी कमेटियों के गठन को लेकर चुप्पी साधे है। भाजपा में गुटबाजी हावी है। सत्ताधारी कांग्रेस को अपनों की नाराजगी डरा रही है। दूसरी ओर कमेटी गठन में देरी को दोष सभापति कोरोनाकाल पर मंढ रहे हैं। कारण जो भी हो, राजनीतिक दलों की भीतरी कलह में शहर की सवा लाख जनता पिस रही है।

छोटे से लेकर बड़े काम के लिए लोगों को सभापति का मुंह देखना पड़ रहा है। व्यस्तता के बीच सभापति हर समय उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में लोगों को एक काम के लिए नगर परिषद के कई चक्कर काटने पड़ रहे हैं। निरंकुश सत्ता पक्ष के कामकाज की गुणवत्ता और गलत निर्णय को उठाने वाला प्रतिपक्ष भी यहां कमजोर पड़ा हुआ है। सही नेतृत्व के अभाव में विपक्ष में रहकर भी भाजपा के पार्षद आवाज नहीं उठा पा रहे हैं। गौरतलब है कि बांसवाड़ा में नवम्बर 2019 में 35 पार्षदों के बूते कांग्रेस ने उसका बोर्ड बनाया था, जबकि 22 पार्षदों के साथ भाजपा प्रतिपक्ष की पार्टी बनी थी। बांसवाड़ा शहर में चुने गए कुल निर्वाचित पार्षदों की संख्या 60 है। इनमें तीन पार्षद निर्दलीय हैं। वहीं 8 मनोनीत पार्षद इस सूची से अलग हैं।

कैसे मिलेगी शहरवासियों को राहत
कायदे से तो बोर्ड गठन के 90 दिन के भीतर कमेटियों का गठन होना चाहिए। इसके बाद बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव लेकर इसे सरकार से अनुमोदन कराना होता है। शहरी आबादी की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए परिषद कमेटियों के माध्यम से कामकाज को बांट देती है। बांसवाड़ा नगर परिषद में लोगों की समस्याओं के लिए अभी 10 तरह की कमेटियां बनाई जाती हैं। इनमें कार्यपालिका (प्रशासनिक) समिति, सौंदर्यकरण समिति, वित्त समिति, अनुज्ञा समिति, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक समिति, भवन निर्माण समिति, अपराधों का समन और समझौता समिति, नियम-उपनियम समिति, स्वास्थ्य समिति होती है। समिति अध्यक्ष पर लोगों की समस्याओं का समाधान करने की जिम्मेदारी होती है। स्वास्थ्य समिति की जिम्मेदारी तो स्वयं उपसभापति पर होती है। समितियों के कामकाज को पारदर्शक बनाने के लिए इसमें प्रतिपक्ष के पार्षदों को भी अलग-अलग समिति में शामिल किया जाता है।

कौन उठाए लोगों की आवाज
सत्ता पक्ष के कामकाज और गलत निर्णय पर अंकुश लगाने के लिए प्रतिपक्ष की भूमिका होती है। लेकिन, बीते 20 माह में बांसवाड़ा शहर में हुए कामकाज को लेकर कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। वजह नेता के अभाव में प्रतिपक्ष कमजोर है। व्यक्तिगत तौर पर कोई भी पार्षद सभापति के कामकाज का आंकलन कर बुरा नहीं बनना चाहता। ऐसे में आम लोगों की परेशानियों का मुद्दा उठाने वाला यहां कोई नहीं है। दूसरी ओर सरकार की ओर से 8 नए पार्षद मनोनीत किए गए हैं। इससे सत्तापक्ष और मजबूत हो गया।

पहली बार 8 मनोनीत पार्षद
सरकार के आदेश के तहत बांसवाड़ा नगर परिषद को 8 मनोनीत पार्षद मिले हैं। यह सभी पार्षद टीएडी राज्यमंत्री अर्जुन बामनिया की सिफारिश से आए हैं। तीन नामों की हाल ही में घोषणा हुई है। पुरानी सूची में मनीष एन त्रिवेदी, रंजीता श्रीमाल, राजेश पटेल, अमित कुमार लालवानी व कालू को मौका मिला था, जबकि अभी वाली सूची में हर्षी खन्ना, शफीक मंसूरी एवं हुसैन को मौका मिला है। इस हिसाब से कांग्रेस ने शहर में विभिन्न समाजों को जोड़ने की कोशिश की है। इन नामों की घोषणाओं के बाद परिषद के बेड़े में अब 68 पार्षद हो गए हैं।

मांगा है मार्गदर्शन
बांसवाड़ा नगर परिषद सभापति जैनेंद्र त्रिवेदी की मानें तो महामारी के बीच कमेटियां गठित करना संभव नहीं था। अब सरकार को इसकी जानकारी देकर मार्गदर्शन मांगा है। अगली बैठक में कमेटियों का गठन करने की तैयारी है। एक बार सत्ता पक्ष के पार्षदों के साथ स्थानीय राज्यमंत्री बामनिया की बैठक रखेंगे। तभी अध्यक्ष चेहरों को तय करेंगे।

सभी जगह अटका
बांसवाड़ा के भाजपा जिलाध्यक्ष गोविंदसिंह राव ने बताया कि प्रतिपक्ष नेता का पैनल जिला स्तर पर भिजवाया जा चुका है। इसकी घोषणा प्रदेश स्तर पर ही होगी। केवल बांसवाड़ा ही नहीं अन्य बहुत सी परिषद और पालिकाएं हैं, जहां नामों की घोषणा शेष है। उम्मीद है कि जल्द ही बांसवाड़ा के नाम की घोषणा होगी।

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