Mon. May 11th, 2026

सोमनाथ मंदिर में पहली बार हुआ ‘कुंभाभिषेक’, जानिए ये क्या होता है और क्यों खास है यह महा-अनुष्ठान

11 मई ये वही ऐतिहासिक तारीख है जिस दिन भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था और आज इसके 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इसलिए इस खास अवसर पर ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ मनाया जा रहा है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे हैं। पीएम मोदी मंदिर की विशेष महापूजा, ध्वजारोहण और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल हुए। खास बात ये है कि पहली बार मंदिर में 11 पवित्र तीर्थस्थलों के जल से विशेष कुंभाभिषेक भी किया गया। लेकिन ये कुंभाभिषेक होता क्या है? इसका क्या महत्व है और ये क्यों जरूरी है? चलिए इस बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।

कुंभाभिषेक क्या है?

कुंभाभिषेक दो शब्दों से मिलकर बना है – कुंभ यानी कलश या पवित्र पात्र और अभिषेक यानी पवित्र स्नान। जब विशेष वैदिक मंत्रों और विधियों से अभिमंत्रित जल को मंदिर के शिखर, कलश और देवी-देवताओं की मूर्तियों पर चढ़ाया जाता है तो उसे कुंभाभिषेक कहते हैं। यह एक तरह का विशेष अनुष्ठान होता है जो दक्षिण भारत के मंदिरों में 10 से 12 वर्षों के अंतराल पर आयोजित किया जाता है। लेकिन सोमनाथ मंदिर में ये अनुष्ठान पहली बार संपन्न हुआ है।

मंदिर की ऊर्जा को करता है जागृत

कुंभाभिषेक एक खास धार्मिक अनुष्ठान है, जो किसी भी तीर्थस्थल या मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए किया जाता है। जब कोई मंदिर नया बनता है, तब सबसे पहले नूतन कुंभाभिषेकम नाम का विशेष अभिषेक किया जाता है। इस अनुष्ठान का उद्देश्य मूर्तियों में देवताओं की ऊर्जा को स्थापित करना होता है। इसके बाद 10 से 12 सालों के अंतराल पर इस ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए कुंभाभिषेक किया जाता है।

सोमनाथ मंदिर में पहली बार होगा ये अनुष्ठान

सोमनाथ मंदिर को फिर से बने 75 साल पूरे हो चुके हैं। ऐसे में पहली बार यहां कुंभाभिषेक किया गया। जिसके लिए विशेष इंतजाम किए गए। मंदिर के ऊंचे शिखर पर देश भर के 11 प्रमुख तीर्थ स्थलों से एकत्रित जल का उपयोग करके कुंभाभिषेक आयोजित किया गया। यह माना जाता है कि मंदिर के शिखर पर जल अर्पण करने से ब्रह्मांडीय ऊर्जा मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग में समाहित हो जाती है।

कुंभाभिषेक कैसे किया जाता है?

  • कुंभाभिषेक की शुरुआत मंदिर परिसर में एक यज्ञशाला बनाने से होती है, जहां पूरे अनुष्ठान का वैदिक आयोजन होता है।
  • वहां कई हवन कुंड बनाए जाते हैं।
  • पवित्र नदियों के जल से भरे कलशों को वहां स्थापित किया जाता है।
  • विद्वान पंडित एक नहीं बल्कि कई दिनों तक वैदिक मंत्रों का जाप करते हैं जिससे मंत्रों की शक्ति कलश के जल में समाहित हो जाती है।
  • फिर अभिषेक वाले

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed